नेशनल डेस्क,श्रेयांश पराशर l
नई दिल्ली l लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मजदूरों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि वे उनके अधिकारों की लड़ाई में “मजबूती से साथ” खड़े रहेंगे। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा नीतियों के कारण देश का मेहनतकश वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपनी आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर उतरने को मजबूर है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि श्रमिकों को आशंका है कि नई श्रम संहिताएँ उनके अधिकारों को कमजोर कर सकती हैं। उनके मुताबिक, काम के घंटे, सामाजिक सुरक्षा और यूनियन संबंधी प्रावधानों को लेकर श्रमिकों में कई तरह की चिंताएँ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को व्यापार समझौतों और बाज़ार व्यवस्था से अपनी आजीविका पर असर पड़ने का डर है। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इसकी अहमियत बताई और कहा कि इसे कमजोर करने से गाँवों की सुरक्षा जाल पर असर पड़ सकता है।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि जिन फैसलों का सीधा संबंध मजदूरों और किसानों के भविष्य से है, उनमें उनकी आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने सरकार से संवाद बढ़ाने और हितधारकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनने की अपील की। साथ ही, उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नीतियाँ व्यापक परामर्श और सहमति से बननी चाहिए।
उधर, सरकार की ओर से समय-समय पर यह कहा जाता रहा है कि श्रम सुधारों और कृषि से जुड़े कदमों का उद्देश्य रोजगार सृजन, निवेश बढ़ाना और किसानों की आय में सुधार करना है। सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्थाएँ प्रक्रियाओं को सरल बनाकर औपचारिक अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि श्रम और कृषि जैसे क्षेत्रों में सुधारों पर बहस स्वाभाविक है, क्योंकि इनका असर बड़ी आबादी पर पड़ता है। ऐसे में पारदर्शिता, चरणबद्ध क्रियान्वयन और लगातार संवाद से ही भरोसा बढ़ाया जा सकता है। मजदूरों और किसानों से जुड़े सवालों पर राजनीतिक दलों के बीच जारी यह विमर्श आने वाले समय में नीति दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।







