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मोतिहारी: भाईचारे के रंगों में घुला उल्लास, अश्लीलता पर भारी परंपरा

लोकल डेस्क, एन के सिंह।

30 हजार जवानों के साये में लिखी गई कौमी एकता की नई इबारत। रमजान के पवित्र महीने के बीच आपसी गिले-शिकवे भुलाकर गुलाल के रंगों में रंगे हर मजहब के हाथ।

पूर्वी चंपारण: चंपारण की ऐतिहासिक और क्रांतिकारी धरती ने एक बार फिर पूरे प्रदेश के सामने मिसाल पेश की है। इस वर्ष होली का महापर्व मोतिहारी में केवल रंगों का खेल बनकर नहीं रहा, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, अटूट परंपराओं और आपसी सौहार्द का एक जीवंत दस्तावेज बन गया। प्रशासन की अभूतपूर्व सख्ती और आम जनमानस की सांस्कृतिक चेतना के कारण इस बार की होली ने आधुनिक शोर-शराबे और फूहड़पन को पीछे छोड़ते हुए अपनी खोई हुई मर्यादा को पुनर्जीवित कर लिया। जिले के चप्पे-चप्पे पर उल्लास का ऐसा मंजर दिखा, जहाँ रंगों की फुहारों में पुरानी कड़वाहटें धुल गईं और भाईचारे का गुलाल हर चेहरे पर चमकता नजर आया।

संस्कृति का पुनरुत्थान, जब फाग की गूँज ने थाम दिया डीजे का शोर

इस वर्ष मोतिहारी की होली की सबसे बड़ी और सुखद उपलब्धि 'संस्कृति की पुनर्स्थापना' रही। पिछले कुछ वर्षों से पर्व की गरिमा को धूमिल कर रहे अश्लील गानों और कानफोड़ू डीजे पर इस बार जिला प्रशासन के हंटर और जनता की जागरूकता ने पूर्ण विराम लगा दिया। गली-मोहल्लों में शोर की जगह ढोल, झाल, डफ और मजीरे की सुरीली थाप सुनाई दी। ग्रामीण अंचलों से लेकर शहर के मठ-मंदिरों तक बुजुर्गों और युवाओं की टोलियां पारंपरिक 'फाग' गीतों पर झूमती नजर आईं। मिट्टी की सोंधी खुशबू वाले इन लोक गीतों ने यह साबित कर दिया कि जब परंपराएं अंगड़ाई लेती हैं, तो आधुनिक फूहड़पन को घुटने टेकने ही पड़ते हैं।

सुरक्षा का अभेद्य किला, 30 हजार जवानों ने संभाली कमान

चूँकि इस बार होली का पर्व रमजान के पवित्र महीने के बीच पड़ा, लिहाजा प्रशासन के लिए शांति व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन जिला प्रशासन की 'चाक-चौबंद' किलाबंदी ने हर आशंका को निर्मूल साबित कर दिया। जिले की सुरक्षा में 30 हजार से अधिक जवानों को तैनात किया गया था, जो हर संवेदनशील मोड़ और चौराहे पर मुस्तैद थे। 2 और 3 मार्च को 'होलिका दहन' की तिथियों को लेकर उपजे संशय के बीच पुलिस की सक्रियता ने किसी भी प्रकार के विवाद को पनपने नहीं दिया। वरिष्ठ अधिकारियों की गाड़ियां रात-भर गश्त करती रहीं, जिससे आम जनता ने भयमुक्त होकर बुराई पर अच्छाई की जीत का यह उत्सव मनाया।

कौमी एकता और सद्भाव का संगम

मोतिहारी की सड़कों पर इस बार जो तस्वीर दिखी, वह हृदयस्पर्शी थी। मजहब और ऊँच-नीच की दीवारें ढह गईं और लोगों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर गले लगाया। पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर समाज के हर वर्ग ने एक साथ मिलकर इस पर्व को मनाया, जो कौमी एकता की एक नई मिसाल बन गया। मंदिरों में विशेष भजनों के बीच श्रद्धालुओं ने सुख-समृद्धि की कामना की, तो वहीं आम नागरिकों ने प्रशासन के साथ कदम से कदम मिलाकर शांति व्यवस्था को सफल बनाया। जिला प्रशासन ने अपने आधिकारिक संदेश में साफ कहा कि यह जीत केवल पुलिस की नहीं, बल्कि मोतिहारी की जनता के उस अटूट विश्वास की है जो प्रेम और भाईचारे को ही सबसे बड़ा धर्म मानती है।

पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरक मिसाल

कुल मिलाकर, मोतिहारी की इस होली ने एक बड़ा संदेश दिया है कि यदि प्रशासन की इच्छाशक्ति दृढ़ हो और जनता का सहयोग साथ हो, तो किसी भी पर्व की असली गरिमा को वापस लाया जा सकता है। अश्लीलता को विदा कर और शांति को गले लगाकर चंपारण ने जो इबारत लिखी है, उसकी गूँज लंबे समय तक सुनाई देगी। यह उत्सव केवल रंगों का मिलन नहीं, बल्कि मोतिहारी के गौरवशाली इतिहास में एक सुनहरे अध्याय की तरह जुड़ गया है, जो पूरे बिहार के लिए अनुकरणीय है।