Ad Image
Ad Image
ट्रंप ने कहा, खाड़ी देशों की अपील पर ईरान पर हमले बंद किए गए || अदाणी समूह को अमेरिका से क्लीनचिट, आपराधिक मामलों में राहत || राहुल गांधी ने कहा, देश में बड़ा आर्थिक संकट आने वाला, आम आदमी होगा परेशान || भारत और नार्वे के बीच कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर, बेहतर सहयोग की पहल: मोदी || अहमदाबाद - मुंबई हाईवे पर दर्दनाक सड़क हादसा, 12 की मौत 25 से ज्यादा घायल || राष्ट्रपति ट्रंप का दावा: समझौते के लिए ईरान बेताब, ईरान का इनकार || Delhi - NCR में सीएनजी फिर महंगा, तीन दिन में तीसरी बार कीमत वृद्धि || PM मोदी का नीदरलैंड दौरा, द्विपक्षीय रिश्ते की बेहतरी पर बल दिया || लन्दन: ब्रिटिश PM कीर स्टारमर दे सकते है इस्तीफा, स्थानीय चुनावों में पार्टी की हार का असर || युद्ध समाप्ति पर ईरान के साथ सकारात्मक बातचीत हुई: राष्ट्रपति ट्रंप

The argument in favor of using filler text goes something like this: If you use any real content in the Consulting Process anytime you reach.

  • img
  • img
  • img
  • img
  • img
  • img

Get In Touch

शंकराचार्य पद विवाद में मेला प्रशासन और संत आमने-सामने

नेशनल डेस्क, श्रेयांश पराशर l

प्रयागराज। मेला प्राधिकरण और शंकराचार्य पद को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर धार्मिक और प्रशासनिक हलकों में बहस तेज कर दी है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से शंकराचार्य होने के प्रमाण मांगे हैं। प्राधिकरण की ओर से जारी नोटिस में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी का हवाला देते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब देने को कहा गया है।

इस नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्पष्ट कहा कि शंकराचार्य होने का निर्णय किसी प्रशासनिक संस्था या राजनीतिक पदाधिकारी का विषय नहीं है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे अन्य पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। उनका दावा है कि द्वारका और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य स्वीकार करते हैं, जबकि तीसरी पीठ की मौन स्वीकृति भी उनके पक्ष में है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी बताया कि पिछले माघ मेले में उन्होंने दोनों शंकराचार्यों के साथ स्नान किया था। ऐसे में यदि अन्य पीठों के शंकराचार्य स्वयं उन्हें शंकराचार्य मान रहे हैं, तो फिर किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब यह तय करेगा कि शंकराचार्य कौन है—प्रशासन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री या देश के राष्ट्रपति? उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह तय करें कि शंकराचार्य कौन है।

उन्होंने कहा कि शंकराचार्य परंपरा से शंकराचार्य ही निर्णय करते आए हैं। पुरी पीठ के शंकराचार्य को इस मामले में निर्णायक माना जाता है। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को लेकर भी भ्रम फैलाया गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि हलफनामे में कहीं यह नहीं लिखा गया कि उन्होंने किसी का विरोध किया है, बल्कि यह कहा गया है कि उनसे समर्थन नहीं मांगा गया था, इसलिए समर्थन नहीं दिया गया।

अंत में उन्होंने दावा किया कि उन्हें दो शंकराचार्यों का प्रत्यक्ष, लिखित और व्यावहारिक समर्थन प्राप्त है और तीसरी पीठ की मौन सहमति भी उनके साथ है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि यदि कोई यह कहता है कि वह ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य है, तो वह सामने आकर संवाद करे। इस पूरे प्रकरण ने मेला प्रशासन, धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक सीमाओं के बीच की रेखा को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।