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सोमनाथ और भारत का प्रखर राष्ट्रबोध

स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना ।

सोमनाथ मंदिर की विरासत और पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का अवसर एक धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर भारत की सांस्कृतिक चेतना, अस्मिता बोध और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया है।

इस अवसर पर देशभर में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के जरिए उन हजार वर्षों की स्मृति को भी याद किया जा रहा है, जब इस मंदिर ने आक्रमण, विध्वंस और पुनर्निर्माण के अनेक दौर देखे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने लेख और संबोधनों में सोमनाथ को विध्वंस से सृजन की भारत की यात्रा का प्रतीक बताया। वे 11 मई 2026 को सोमनाथ में आयोजित अमृत महोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे हैं। यह वही दिन है, जब 1951 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन किया था। इस ऐतिहासिक मंदिर का सामयिक संदर्भ इसलिए बड़ा है क्योंकि विवाद, तनाव और हिंसक संघर्ष के दौर में भारत वैश्विक मंच पर एक सॉफ्ट पावर के तौर पर स्थापित हो रहा है। भारत की इस अंतरराष्ट्रीय हैसियत और साख की ताकत का हमारा सांस्कृतिक स्वाभिमान है। इस स्वाभिमान का गर्व तो होना ही चाहिए, इसकी रक्षा के लिए भी देश और समाज का साझा संकल्प प्रकट होना चाहिए।

इस लिहाज से पीएम मोदी के ये शब्द महत्वपूर्ण हैं “सोमनाथ भारत की उस अटूट चेतना का प्रतीक है, जिसे बार-बार तोड़ने की कोशिश हुई, लेकिन वह हर बार और अधिक शक्ति के साथ खड़ी हुई।” इस लिहाज से देखें तो यह असर सरदार वल्लभभाई पटेल, केएम मुंशी और अहिल्याबाई होल्कर जैसी शख्सियतों के स्मरण का भी है, जिन्होंने सोमनाथ के रूप में भारतवर्ष की आस्था, विरासत और स्वाभिमान जागृत और प्रदीप्त बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 

अच्छी बात यह है कि यह अवसर राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना के साथ देश और समाज को नए सिरे से जोड़ रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिहार जैसे सूबे के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपने कार्यक्रमों  के बीच इस बात को बार-बार नहीं दोहराते कि अयोध्या, काशी और सोमनाथ नए भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना के तीर्थ की तरह हैं। आगे वे ये भी कहते हैं कि देश की नई पीढ़ी को अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक संघर्षों के इतिहास से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय चेतना मजबूत हो सके।

दिलचस्प है कि कुछ महीने पूर्व मेवाड़ के गौरव महापराक्रमी राणा सांगा के शौर्य और राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठा तो राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश में आक्रोश दिखा। दरअसल, यह नया भारत है, यह वैश्विक रंगमंच पर आकार लेता भारतवर्ष का नया देशकाल है। यह विरासत के साथ विकास का साझा विकसित करने वाला भारत है। आजादी के बाद के दशकों में इस देशकाल का वैचारिक अक्षांश और देशांतर किस तरह तय हुआ, वह देखना खासा दिलचस्प है। इसमें सबसे बड़ी बात यह कि आजादी के बाद खासतौर पर देश में नब्बे के दशक में जब अस्मितावादी राजनीति का जोर बढ़ा तो उसके दूरगामी फलित को समझने में बड़ी चूक हुई। यह राजनीति सामाजिक अन्याय के खिलाफ महज एक प्रतिक्रिया से ज्यादा आज अपने अतीत से बड़ी मुठभेड़ साबित हो रही है। यह मुठभेड़ भारत जैसे देश में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसका अतीत सभ्यता के विकास के उत्स तक की यात्रा कराता है। आज अगर अपनी पहचान और गौरव की ललक देश-समाज में बढ़ी है तो इसका प्रतिबिंबन सरकारों के विवेक में भी दिखता है। 

राजनीतिक गहमागहमी के बीच पीएम मोदी से लेकर बिहार के सीएम सम्राट चौधरी का स्वर अगर एक है तो यह इसलिए कि राष्ट्र-प्रथम की शपथ के बिना आज भारत में न किसी राजनेता की स्वीकृति संभव है और न ही किसी राजनीतिक विमर्श की । बात अकेले बिहार की करें तो लोगों ने हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव के दौरान देखा कि विकास और विरासत को लेकर जनता में ललक पैदा हुई है वह चुनाव नतीजे में भी दिखा। आज की तारीख में अगर कोई बिहार की राजधानी पटना जाए तो सभ्यता द्वार, ज्ञान भवन, बापू टावर से लेकर नवनिर्मित बिहार संग्रहालय तक हर जगह अशोक कालीन स्मृतियों से ऐतिहासिक तौर पर जुड़ा यह प्रदेश आज अपने स्व की पहचान के साथ अपने सांस्कृतिक वैभव पर नाज करता दिखेगा। 

आज देश में विकास और विरासत से जुड़े इन उदाहरणों का फलक बड़ा है और इससे इतिहास बोध को लेकर विमर्श के कई मुहाने एक साथ खुलते हैं। इसमें सबसे अहम यह है कि मौजूदा सदी के दो-ढाई दशक में देश में जिस तरह की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति बनी है, उससे अतीत और इतिहास की मिट्टी पलटते हुए अपनी पहचान को सुदृढ़ देखने की मनोदशा स्वाभाविकता में तब्दील हुई है। ऐसे में इतिहास लेखन और इतिहास दृष्टि को लेकर बात भी नए सिरे से करने की जरूरत है। सवाल है कि इतिहास के पुनर्लेखन और साक्ष्यों के पुनर्परीक्षण के जरिए हम अपने अतीत बोध को किसी नए और वैकल्पिक सांचे में गढ़ रहे हैं या फिर औपनिवेशिक मानसिकता से लैस लीक पर ही आगे बढ़ रहे हैं।

यह भी कि इतिहास लेखन में व्यक्तिपरक दृष्टिकोण की आशंका बनी रहती है। इस बात से कहीं इनकार नहीं कि भारत का प्रचलित आधुनिक इतिहास विदेशी आक्रांताओं, अंग्रेजी शासन और वामपंथी विचारधारा से जुड़े इतिहासकारों की देन है। भारत की संपन्नता और वैभव उन्हें आकर्षित करता था। इसी तरह अंग्रेजों की औपनिवेशिक दृष्टि में ईसाई धर्म को लेकर उनका परम भाव सबसे अहम रहा। अपने धर्म को उन्होंने तकरीबन मानवता और मानव सभ्यता के बरक्स खड़ा कर दिया। भारत में पुराने शिक्षा संस्थानों से लेकर शासन पद्धति और कानूनों में आज भी यह छाप नजर आती है। इस दौर में भारतीय संस्कृति और सभ्यता को उसके ‘स्व’ से रणनीतिक तौर पर विमुख किया गया।

इतिहास लेखन और उसके बोध को लेकर इन तमाम स्थितियों के बीच बात वर्तमान चिंताओं की करें तो आज भी कुछ लोग पूर्व के अन्याय और ज्यादतियों से निकलने के बजाय उसकी छाया में खड़े होकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं। यह एक निहायत बचकानी स्थिति है। दरअसल, अपने इतिहास में अपने ‘स्व’ की खोज के लिए हमें ज्यादा गंभीर होने की जरूरत है। इस दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण नाम है इतिहासकार डॉ. धर्मपाल का। उनकी लिखी एक छोटी सी पुस्तिका है- भारतीय चित्त, मानस और काल। इसमें डॉ. धर्मपाल वैसी तमाम मानसिकता से मुक्त होने की दरकार सामने रखते हैं, जो हमें अतीत के गौरव से दूर करती है। सोमनाथ जैसी शानदार सांस्कृतिक विरासत पर गौरव का ऐतिहासिक अवसर ऐसी हर दूरी को मिटाने में कारगर होगा, यही उम्मीद है और यही कामना भी।