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हिंदूवादी नेता भैरव सिंह की जमानत अर्जी खारिज: झारखंड हाईकोर्ट

स्टेट डेस्क, प्रीति पायल |

झारखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को हिंदूवादी नेता भैरव सिंह की बेल अर्जी पर सख्त रुख अपनाया और उन्हें राहत देने से मना कर दिया। कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद भैरव सिंह के वकीलों को अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी।

यह विवाद रांची के चुटिया पुलिस स्टेशन एरिया में पार्किंग कॉन्ट्रैक्ट को लेकर शुरू हुआ था। आरोप लगाया गया है कि भैरव सिंह और उनके साथियों ने विरोधियों के साथ मारपीट की, जिससे स्थिति हिंसक हो गई। इस घटना के संबंध में पुलिस ने केस नंबर 125/2025 दर्ज किया और 19 जुलाई 2025 को भैरव सिंह को हिरासत में लिया गया।

रांची की अधीनस्थ अदालत में न्यायाधीश अनिल कुमार मिश्रा की कोर्ट ने 13 अगस्त 2025 को पहली बार जमानत अर्जी नामंजूर की थी। कोर्ट ने केस फाइल और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद भैרव सिंह की संलिप्तता को स्थापित पाया था।

निचली अदालत के निर्णय के विरुद्ध भैरव सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील कीर्ति सिंह ने सीसीटीवी रिकॉर्डिंग और अपडेटेड केस डायरी प्रस्तुत करने की मांग रखी थी। पहली सुनवाई 8 अगस्त को हुई, जिसके बाद अगली तारीख 13 अगस्त निर्धारित की गई।

गुरुवार की सुनवाई में हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। बचाव पक्ष का तर्क था कि यह सामान्य झगड़ा है और कोई गंभीर अपराध सिद्ध नहीं हुआ है। उन्होंने कस्टडी की अवधि को देखते हुए जमानत की अपील की।

सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए केस रिकॉर्ड के आधार पर भैरव सिंह की मुख्य भूमिका को उजागर किया। आंशिक सुनवाई के बाद कोर्ट ने जमानत देने से स्पष्ट इनकार कर दिया, जिसके कारण बचाव पक्ष को अपनी अर्जी वापस लेने को मजबूर होना पड़ा।

भैरव सिंह झारखंड के प्रभावशाली हिंदूवादी नेता हैं जो कई संगठनों से जुड़े हैं। वे पहले भी कानूनी समस्याओं में फंसे हैं, जैसे 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के काफिले पर हमले का मामला, जिसमें बाद में उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। फिलहाल भैरव सिंह रांची केंद्रीय कारागार में न्यायिक हिरासत में हैं। याचिका वापस लेने से मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन नई अपील दायर करने का विकल्प खुला रहता है। पुलिस अपनी जांच जारी रखे हुए है और गवाहों के बयान तथा सबूत इकट्ठे कर रही है। कोर्ट ने पुलिस को जल्दी चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह प्रकरण झारखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां हिंदूवादी संगठनों और स्थानीय प्रशासन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।