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होर्मुज नाकेबंदी पर ब्रिटेन ने अमेरिका से दूरी बनाई

विदेश डेस्क, ऋषि राज

लंदन/अंकारा, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी वैश्विक चिंता के बीच ब्रिटेन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका के नेतृत्व में ईरान के खिलाफ किसी सैन्य नाकेबंदी अभियान में शामिल नहीं होगा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार को यह बयान देते हुए कहा कि उनका देश क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय शांति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के पालन के पक्ष में है।

प्रधानमंत्री स्टार्मर ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस मार्ग के अवरुद्ध होने या वहां सैन्य टकराव बढ़ने से पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि यह समुद्री रास्ता नौवहन के लिए पूरी तरह खुला रहे, ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार सामान्य रूप से चलता रहे।

स्टार्मर ने दो टूक शब्दों में कहा, “यह हमारा युद्ध नहीं है और हम इसमें नहीं फंसेंगे।” उनके इस बयान को ब्रिटेन की स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीतिक रुख के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि ब्रिटेन इस समय किसी भी सैन्य संघर्ष से दूरी बनाकर आर्थिक और रणनीतिक संतुलन बनाए रखना चाहता है।

उधर, ऑस्ट्रेलिया ने भी इसी तरह का रुख अपनाया है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि उनके देश को अमेरिका की ओर से किसी नाकेबंदी अभियान में शामिल होने का कोई औपचारिक अनुरोध नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक है।

इस बीच तुर्की ने भी कूटनीतिक पहल का समर्थन किया है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने उम्मीद जताई कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बना तनाव जल्द ही बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्धविराम अवधि को 45 से बढ़ाकर 60 दिन किया जाना चाहिए, ताकि दोनों पक्षों को वार्ता का पर्याप्त समय मिल सके।

विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस का परिवहन होता है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और ऊर्जा संकट गहरा सकता है।

ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और तुर्की के बयानों से यह संकेत मिला है कि कई देश सैन्य टकराव से बचते हुए कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहते हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर वैश्विक राजनीति और तेज हो सकती है।