लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: जीवन यात्रा में या इस सृष्टि में एक बहुचर्चित शब्द है,जिसे प्रेम हम कहते हैं।प्रेम ईश्वरीय,प्रकृति से, मानवीय, वस्तुओं आदि किसी से भी हो सकता।
विभिन्न शायरों, साहित्यकारों,अध्यात्मविदों व विद्वानों ने विभिन्न रूपों में इस प्रेम शब्द की व्याख्या की है,पर आज तक इस शब्द को किसी भी पूर्ण रूप में परिभाषित नहीं किया जा सका।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। जैसे ईश्वर को किसी परिभाषा की सीमा में नहीं बाँधा जा सका,वैसे ही प्रेम की कोई सीमा नहीं ; क्योंकि यह असीम है,अनंत है। संत कबीर ने कहा है कि जिसने इस ढाई अक्षर के प्रेम को जान लिया,उसके लिए कुछ और जानना शेष न रहा। जिसने किसी भी रूप के प्रेम को चख लिया,जिसने प्रेमरस पी लिया,उसकी प्यास सदा के लिये बुझ गई।जो प्रेम में डूब गया,उसने सचमुच ज्ञान को पा लिया।प्रेम हो ज्ञान है और प्रेमी ही ज्ञानी है।
जो अप्रेमी है वही अज्ञानी है।सच में प्रेम शब्द एक अनुपम मिठास असीम सौंदर्य,एक अजीब-सी-महक समेटे हुए है।तभी तो बोलने और सुनने मात्र से शरीर में सिहरन होने लगती एवं हमारे प्राणों में एक नूतन स्पंदन होने लगता है।प्रेम का वह शाश्वत सौंदर्य व आनंद ही है,जिसके लिए मीरा ने हँसते-हँसते जहर पी लिया,जिसके लिए बुद्ध,महावीर राजपाट छोड़ गये,जिसके लिए गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने पुत्रों की बलि दे दी,जिसके लिए शबरी प्रभु राम को जूठे बेर खिला गई,जिसके लिए गोपियाँ श्री कृष्ण की हो गईं और जिसके लिए भक्त और भगवान भी एक दूजे के हो गए।प्रेम लैंगिक या प्राणिक आकर्षण और आदान-प्रदान नहीं है,हृदय की भूख नहीं है।प्रेम एकमेव से आया शक्तिशाली स्पंदन है और केवल बहुत शुद्ध और बहुत मजबूत व्यक्ति ही उसे पाने और अभिव्यक्ति करने के योग्य होते हैं।प्रेम से किसी को हराया नहीं जा सकता,पर जीता अवश्य जा सकता है ; क्योंकि हार जाने पर भी जीत प्रेम की ही होती है।







