नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को बड़ा झटका देते हुए कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के असिस्टेंट प्रोफेसरों/शिक्षकों को पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने से जुड़ी अधिसूचना को रद्द कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान आयोग के तर्कों को असंतोषजनक बताते हुए कड़ी नाराजगी भी जाहिर की।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आयोग यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि असिस्टेंट प्रोफेसरों को मतदान केंद्रों पर पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनात करने की आवश्यकता क्यों है। इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी भी पेशेवर वर्ग को चुनावी ड्यूटी में शामिल करते समय उनके पद, वेतनमान और कार्य की प्रकृति का ध्यान रखा जाना जरूरी है।
यह याचिका कॉलेज शिक्षिका रूपा बनर्जी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि शिक्षकों को इस प्रकार की जिम्मेदारी देना न तो उचित है और न ही उनके मूल कार्य से मेल खाता है।
आयोग की तरफ से पेश वकील ने अदालत को बताया कि 2023 में जारी नए दिशानिर्देशों के तहत 2010 के नियमों को बदला गया है और चुनावी कानून की धारा 26 जिला निर्वाचन अधिकारियों को शिक्षकों को चुनावी कार्य में लगाने का अधिकार देती है। हालांकि, कोर्ट इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ।
सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने आयोग की व्याख्या पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो फिर आयोग किसी भी पेशे—यहां तक कि न्यायाधीशों—को भी चुनावी ड्यूटी में लगा सकता है। उन्होंने इसे अव्यवहारिक और असंगत बताते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया कि चुनावी कार्यों के लिए सरकार के अन्य कर्मचारियों को नियुक्त किया जाना चाहिए, न कि शिक्षण कार्य से जुड़े लोगों को। इसके जवाब में आयोग ने कहा कि चुनाव नजदीक हैं और इस समय न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
अंततः अदालत ने आयोग की इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पारदर्शिता और तर्कसंगतत. के अभाव में जारी की गई अधिसूचना को बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उक्त अधिसूचना को निरस्त कर दिया, जिससे आयोग को चुनावी व्यवस्था को लेकर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी।






