नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नयी दिल्ली : कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (एमओयू)’ को लेकर केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका बताया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते ने क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका को उजागर किया है, जो भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
श्री रमेश ने कहा कि इस समझौते को ‘इस्लामाबाद एमओयू’ के नाम से जाना जाना अपने आप में महत्वपूर्ण संकेत है। उनके अनुसार, यह दर्शाता है कि पाकिस्तान पश्चिम एशिया से जुड़े रणनीतिक और सुरक्षा मामलों में पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली स्थिति हासिल कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि यह स्थिति भारत की मौजूदा विदेश नीति की सीमाओं को भी सामने लाती है।
कांग्रेस नेता ने वर्ष 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में सफलता मिली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान परिदृश्य में पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता और प्रभाव बढ़ा है, जिसके दूरगामी प्रभाव भारत की रणनीतिक स्थिति पर पड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि यह समझौता अपनी निर्धारित शर्तों और मूल भावना के अनुरूप लागू होता है तो क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। हालांकि उन्होंने आशंका भी जताई कि यह समझौता व्यवहारिक स्तर पर अपेक्षित परिणाम देने में विफल रह सकता है। उनके अनुसार, आगामी 60 दिन इस समझौते की वास्तविक प्रभावशीलता और सफलता को परखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होंगे।
श्री रमेश ने दावा किया कि इस समझौते से ईरान को कई ऐसे लाभ प्राप्त हुए हैं जिनकी पहले व्यापक रूप से अपेक्षा नहीं की जा रही थी। उन्होंने कहा कि ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम में अपने धैर्य, प्रतिरोध क्षमता और रणनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया है। साथ ही उनका मानना है कि खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देशों ने समझौते का सतर्क स्वागत किया है और वे क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपने रणनीतिक संबंधों की समीक्षा भी कर सकते हैं।
कांग्रेस महासचिव ने इस घटनाक्रम को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए कूटनीतिक झटका बताते हुए कहा कि क्षेत्रीय परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद भारत सरकार इजरायल के प्रति अपने समर्थन के रुख पर कायम दिखाई दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की यह नीति दीर्घकाल में भारत के व्यापक रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए महंगी साबित हो सकती है।
उन्होंने अमेरिका की भूमिका पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि ईरान के विरुद्ध शुरू किए गए सैन्य अभियानों से घोषित उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति नहीं हो सकी है। श्री रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी पर अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार की विदेश नीति को लेकर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।







