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कांतारा वाले देवता का कमाल! वॉशिंगटन म्यूजियम में सजा पंजुर्ली मुखौटा, भारत का मान बढ़ा

नेशनल  डेस्क, आर्या कुमारी |

भारत की परंपराएं और संस्कृति एक बार फिर दुनिया में चर्चा का विषय बनी हैं। कर्नाटक के तटीय क्षेत्र तुलुनाडु से जुड़ा पवित्र ‘पंजुर्ली मुगा’ मुखौटा अब अमेरिका के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट, वॉशिंगटन डी.सी. में प्रदर्शित है। यह भारत की प्राचीन लोक और धार्मिक परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

आस्था और परंपरा का प्रतीक

यह मुखौटा तुलु भाषा बोलने वाले क्षेत्रों दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में प्रचलित भूत कोला परंपरा से जुड़ा है। इस अनुष्ठान में ‘पंजुर्ली दैव’ नामक देवता की पूजा की जाती है, जिन्हें धरती और लोगों की रक्षा करने वाला माना जाता है। पूजा के दौरान कलाकार मुखौटा पहनकर नृत्य करते और भक्ति गीत गाते हैं। यह मुखौटा लकड़ी, धातु या सुपारी के पेड़ के हिस्से से बनाया जाता है। इसमें की गई बारीक नक्काशी देवता के उग्र लेकिन रक्षक रूप को दर्शाती है।

भारत की लोक कला को मिला विदेशी मंच

वॉशिंगटन के इस म्यूजियम में पंजुर्ली मुखौटा भारत की लोक और अनुष्ठानिक कलाओं पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी का हिस्सा है। इसका उद्देश्य दुनिया को भारत की क्षेत्रीय परंपराओं और उनकी गहराई से परिचित कराना है। म्यूजियम के विशेषज्ञों ने कहा कि यह मुखौटा “दैवी ऊर्जा की जीवंत झलक” है। उनके अनुसार, इसमें न केवल सौंदर्य है बल्कि प्रकृति और समाज से जुड़ी भावनाओं की झलक भी दिखाई देती है। प्रदर्शनी में भूत कोला की कहानी, इतिहास और विकास पर आधारित वीडियो और तस्वीरें भी प्रदर्शित की गई हैं।

गाँव के उत्सव से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक

भूत कोला सदियों से तुलुनाडु के गाँवों में एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन रहा है। इसमें लोग संगीत, नृत्य और रंगीन परिधानों के साथ देवता की आराधना करते हैं। पंजुर्ली दैव, जिन्हें अक्सर सूअर जैसे दाँतों के साथ दिखाया जाता है, साहस, उर्वरता और भूमि की रक्षा के प्रतीक हैं। संस्कृति विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुखौटे का अमेरिका में प्रदर्शित होना दक्षिण भारत की उस परंपरा का सम्मान है, जहाँ भक्ति, शिल्पकला और पर्यावरण का अद्भुत संगम है।

भारत की संस्कृति को मिला वैश्विक सम्मान

भारत के संस्कृति मंत्रालय ने इस प्रदर्शनी को भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) का उदाहरण बताया है। हाल के वर्षों में अमेरिका और यूरोप के कई म्यूजियम में भारत की जनजातीय और लोक कलाओं की प्रदर्शनी बढ़ी है।भारत में भी कई संस्थान इन परंपराओं को दस्तावेज़ित और संरक्षित करने पर काम कर रहे हैं, ताकि यह कलाएँ आधुनिक समय में भी जीवित रह सकें।

तुलुनाडु में खुशी की लहर

तुलुनाडु के लोगों के लिए यह गर्व का क्षण है। स्थानीय कलाकारों और विशेषज्ञों ने इसे क्षेत्र की आस्था और कला दोनों का सम्मान बताया है।

उडुपी के एक लोक कलाकार ने कहा: “हमारे लिए पंजुर्ली सिर्फ देवता नहीं, बल्कि भावना हैं। वे हमारी ज़मीन और समाज के रक्षक हैं। जब हमारी परंपरा विदेश में सम्मान पाती है, तो हमें बेहद गर्व होता है।”

वॉशिंगटन म्यूजियम में पंजुर्ली मुगा मुखौटे का प्रदर्शन भारत की भक्ति, परंपरा और कला को नई अंतरराष्ट्रीय पहचान दे रहा है। तुलुनाडु की यह जीवंत परंपरा अब दुनिया भर के दर्शकों को भारत की आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विविधता से परिचित करा रही है।