लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: इस दृश्यमान जगत् में जन्म-मरण का खेल अविराम चल रहा है। यहाँ इस प्रकृति के जादूघर में कुछ भी स्थिर या नित्य नहीं है। संहार को ह्रदय से लगाए हुए ही सृजन का उदय होता है।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।जीवन में अपनापन,ममता जो ईश्वर ने दिया है,सही में वही हमारे दुःखों का कारण भी है। जो पाकर हंसता है,उसको खोकर उससे कई गुना अधिक रोना ही पड़ता है और यहाँ का यह पाना होता ही है खोने के लिए - जन्म होता ही है मृत्यु के लिए - संयोग उत्पन्न ही होता है वियोग के निश्चित विधान को साथ लेकर! हम कुछ दिन रोते हैं, दुःखी होते हैं फिर उसी भाँति हम भी इस चोले को छोड़ कर नए के लिए चलते हैं ; चोला पुराना होने पर भी मोहवश छोड़ते हम घबराते हैं ; ममत्व के कारण किसी प्रकार की भी जरा भी विनाश की आशंका हमें व्याकुल कर देती है ;
परंतु विनाश तो अवश्यंभावी है ; नवीन सृजन के लिए उसकी आवश्यकता है,वह होता ही है और होता ही रहेगा।कब तक ? सो कौन कह सकता है।परंतु इतना तो कहा जा सकता है कि यह जन्म-मरणयुक्त जगत् चाहे सदा रहे ; परंतु इसमें हमारा जो विषयों के साथ ममत्व का संबंध है,वह तो सदा कभी नहीं रहेगा।आज हम अपने शरीर में माता,पिता,स्त्री,स्वामी,पुत्र-कन्या, आदि से प्रेम करते हैं,उनके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकते।उनका जरा सा अदर्शन भी हमें असह्य हो जाता है।पर जब हम उन्हें छोड़ जाते हैं और दूसरे चोले में पहुँच जाते हैं,तब उनको याद भी नहीं करते।यही जीवन का सच्चा रहस्य एवं कड़वा सच है।






