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पटेल जीवित रहते, तो न मोदी होते, न संघ: डॉ. उदित राज

नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी |

अगर पटेल कुछ दिन और जीवित रहते, तो न मोदी होते, न संघ: उदित राज का RSS पर सीधा हमला....

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता डॉ. उदित राज ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा प्रहार करते हुए दावा किया है कि अगर सरदार वल्लभभाई पटेल कुछ और दिनों तक जीवित रहते, तो न तो मोदी जी का दौर आता और न ही संघ जैसी कोई ताकत खड़ी हो पाती। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हंगामा मचा दिया है, क्योंकि यह स्वतंत्रता सेनानी पटेल की विरासत को केंद्र में रखकर वर्तमान सत्ता पर सवाल खड़े करता है। डॉ. राज ने आरएसएस को 'आतंकी संगठन' तक करार देते हुए महात्मा गांधी की हत्या के लिए भी इसे जिम्मेदार ठहराया, जो भारतीय राजनीति के संवेदनशील मुद्दों को फिर से उछालने का काम कर रहा है।

 पटेल की विरासत पर सियासी जंग

डॉ. उदित राज का यह बयान दिल्ली में एक सभा के दौरान आया, जहां उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की भूमिका पर चर्चा की। उनका कहना था कि सरदार पटेल, जिन्हें 'लौह पुरुष' के रूप में जाना जाता है, ने देश के एकीकरण में ऐतिहासिक योगदान दिया। लेकिन अगर वे 1950 में अपनी मृत्यु के बाद कुछ वर्ष और जीवित रहते, तो वे आरएसएस जैसी विचारधाराओं को जड़ से उखाड़ फेंकते। "पटेल जी की मजबूत नीतियां और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण संघ की साजिशों को कभी फलने-फूलने न देते," उन्होंने जोर देकर कहा। इस दावे ने न केवल आरएसएस की वैचारिक नींव पर सवाल उठाए, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी पटेल की छत्रछाया से जोड़कर चुनौती दी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पटेल को अपनी परंपरा का हिस्सा बताकर भाजपा के दावों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। भाजपा लंबे समय से पटेल को अपना प्रतीक बनाए हुए है, खासकर 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए। लेकिन डॉ. राज ने इसे उलटते हुए कहा कि पटेल की असली विरासत कांग्रेस की एकजुटता और धर्मनिरपेक्षता में छिपी है, जो संघ की कथित 'विभाजनकारी' राजनीति से बिल्कुल अलग है।

आरएसएस पर 'आतंकी' का ठप्पा, गांधी हत्या का जिक्र

बयान का सबसे विवादास्पद हिस्सा तब आया जब डॉ. उदित राज ने आरएसएस को खुलेआम 'आतंकी संगठन' बता दिया। उन्होंने दावा किया कि संगठन की विचारधारा ने स्वतंत्रता के बाद भी हिंसक घटनाओं को बढ़ावा दिया, जिसमें महात्मा गांधी की 1948 में हत्या प्रमुख है। "गांधी जी की हत्या के पीछे संघ का हाथ था, और पटेल जी अगर जीवित होते, तो वे इसकी सख्ती से निपटते," राज ने कहा। यह आरोप नया नहीं है, लेकिन एक प्रमुख कांग्रेस नेता के मुंह से आना इसे नई ऊंचाई दे रहा है।

आरएसएस पर ऐसे आरोप ऐतिहासिक बहस का विषय बने हुए हैं। संगठन ने हमेशा इन दावों को खारिज किया है और खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवादी बताता रहा है। लेकिन डॉ. राज ने इसे 'आतंकवाद का बीज' करार देकर बहस को और गर्म कर दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में पटेल की मजबूत प्रशासनिक नीतियां ऐसी किसी भी ताकत को कुचल देतीं, जो राष्ट्र की एकता को चुनौती दे। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तुरंत प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ला दी, जहां समर्थक इसे 'साहसी सत्य' बता रहे हैं, तो आलोचक इसे 'इतिहास का विकृतिकरण' कह रहे हैं।

पटेल-कांग्रेस का पुराना नाता, भाजपा की चुनौती

भारतीय राजनीति में सरदार पटेल हमेशा से एक विवादास्पद प्रतीक रहे हैं। कांग्रेस उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का स्तंभ मानती है, जिन्होंने नेहरू सरकार में गृह मंत्री के रूप में 562 रियासतों का एकीकरण कराया। पटेल की 1875 में गुजरात के नडियाद में जन्म से लेकर 1950 में उनकी मृत्यु तक की यात्रा, देशभक्ति और दृढ़ता की मिसाल है। डॉ. राज ने इसी विरासत का सहारा लेते हुए कहा कि पटेल की दृष्टि में कोई जगह नहीं थी संघ जैसी 'गुप्त साजिशों' के लिए।

दूसरी ओर, भाजपा ने पटेल को अपनाने की कोशिश में कई कदम उठाए हैं। 2014 से ही पार्टी ने पटेल को 'भूले-बिसरे नायक' के रूप में पेश किया, नेहरू पर पटेल की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए। लेकिन कांग्रेस नेता का यह बयान उस नैरेटिव को पलटने की कोशिश लगता है। राज ने कहा, "पटेल जी की मृत्यु के बाद ही संघ को सांस मिली, वरना उनकी एक नजर में सब खत्म हो जाता।" यह टिप्पणी न केवल मोदी की गुजरात से उभरी राजनीति पर तंज कसती है, बल्कि पूरे संघ परिवार की वैधता पर सवाल खड़ी करती है।

 सियासी खींचतान में पटेल का इस्तेमाल

पटेल को लेकर दोनों दलों की होड़ कोई नई बात नहीं। 2018 में गुजरात में हुए 'पटेल आरक्षण आंदोलन' से लेकर संसद में पटेल पर बहस तक, यह मुद्दा बार-बार उभरता रहा। कांग्रेस का तर्क है कि पटेल नेहरू के साथ मिलकर आधुनिक भारत की नींव रखी, जबकि भाजपा उन्हें 'हिंदुत्व का प्रतीक' बताती है। डॉ. उदित राज का बयान इसी जंग का नया अध्याय जोड़ता है। उन्होंने सभा में उपस्थित कार्यकर्ताओं से अपील की कि पटेल की सच्ची विरासत को बचाना जरूरी है, ताकि 'विभाजनकारी ताकतें' हावी न हों।

यह बयान आगामी चुनावी माहौल को देखते हुए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों में जहां पटेल समुदाय का प्रभाव है, वहां यह मुद्दा वोटरों को प्रभावित कर सकता है। राज ने कहा कि अगर पटेल जीवित होते, तो वे आज की राजनीति को 'एकजुट राष्ट्रवाद' की दिशा देते, न कि 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' की। इस दावे ने विपक्षी दलों में उत्साह भर दिया है, जबकि सत्ताधारी खेमे में इसे 'तुच्छ राजनीति' बताने की कोशिश हो रही है।

बयान का व्यापक असर

डॉ. उदित राज, जो खुद दलित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए जाने जाते हैं, ने इस बयान से अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश की लगती है। पूर्व आईपीएस अधिकारी से राजनेता बने राज ने 2014 में भाजपा से कांग्रेस का सफर तय किया है, और ऐसे बयानों से वे विपक्ष की आवाज बनने का दम भरते हैं। उनका कहना है कि पटेल की मौत के बाद पैदा हुई 'शून्यता' ने संघ को मौका दिया, जो आज सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुका है।

इस बीच, बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। इतिहासकारों का एक वर्ग इसे पटेल के वास्तविक योगदानों की याद दिलाने वाला मानता है, तो दूसरा इसे 'व्यक्तिगत हमला' कह रहा है। लेकिन साफ है कि यह टिप्पणी राजनीतिक तापमान को और ऊंचा कर रही है, जहां पटेल की छवि दोनों पक्षों के लिए चुनावी हथियार बनी हुई है।