एंटरटेनमेंट डेस्क, अर्पिता कृष्णा |
फादर्स डे के अवसर पर हिंदी सिनेमा में पिता के किरदारों की भूमिका एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय फिल्मों में पिता को केवल परिवार के मुखिया के रूप में नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन, संघर्ष और मार्गदर्शन के प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि पिता पर केंद्रित कई किरदार और कहानियां आज भी दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान रखती हैं।
हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में पिता के चरित्र को परिवार के संरक्षक और मूल्यों के रक्षक के रूप में दिखाया जाता था। समय के साथ इन किरदारों में बदलाव आया, लेकिन उनकी भावनात्मक गहराई और महत्व बरकरार रहा।
पिता-पुत्र संबंधों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाली फिल्मों में वर्ष 1951 में रिलीज हुई ‘आवारा’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। फिल्म में पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर ने पिता और पुत्र के जटिल रिश्ते को पर्दे पर जीवंत किया था। न्यायाधीश रघुनाथ और उनके पुत्र राज के बीच वैचारिक संघर्ष फिल्म की मुख्य धुरी रहा, जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराहा।
वहीं, वर्ष 1960 में रिलीज हुई ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में पृथ्वीराज कपूर ने सम्राट अकबर की भूमिका निभाई थी। फिल्म में अकबर को एक ऐसे पिता के रूप में दिखाया गया है जो अपने पुत्र सलीम से प्रेम करता है, लेकिन राजधर्म और साम्राज्य की मर्यादा को सर्वोपरि मानता है। अकबर और सलीम के बीच का संघर्ष हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पिता-पुत्र संबंधों में गिना जाता है।
फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय के साथ हिंदी फिल्मों में पिता के किरदार अधिक संवेदनशील और बहुआयामी हुए हैं। आज के दौर में भी पिता की भूमिका पर आधारित कहानियां दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल रहती हैं।
फादर्स डे के मौके पर हिंदी सिनेमा के ये यादगार किरदार न केवल पिता के महत्व को रेखांकित करते हैं, बल्कि परिवार, जिम्मेदारी और रिश्तों के मूल्यों को भी मजबूती से सामने लाते हैं।







